भक्ति क्या हैं?
"भक्ति" हाथ पैरों से नहीं होती हैं। वर्ना विकलांग कभी नहीं कर पाते।
भक्ति ना ही आँखों से होती हैं
वर्ना सूरदास जी कभी नहीं कर पाते
ना ही "भक्ति "
बोलने सुनने से होती हैं वर्ना "गूँगे""बेहरे" कभी नहीं कर पाते।
ना ही "भक्ति"धन और ताकत से होती हैं वर्ना गरीब और कमजोर कभी नहीं कर पाते।
"भक्ति" केवल भाव से होती हैं
एक अहसास हैं "भक्ति "
जो हृदय से होकर विचारों में आती हैं और हमारा प्रेम परमात्मा से जुड़ कर रिश्ते में बदल जाती हैं।
"भक्ति" भाव का सच्चा सागर हैं।।
आशुतोष स्नेहसागर मिश्रा
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