आतंकवाद पर जब जब परिचर्चा होती है तमाम तथाकथित सेक्युलर बुद्धिजीवियों द्वारा ये तर्क प्रस्तुत किया जाता है की आतंक का कोई मजहब नहीं होता आतंकी किसी मजहब के नहीं होते किन्तु ये सर्वविदित है की विश्व के 99.9% आतंकवादी इस्लाम के अनुयायी ही होते हैं ऐसे में प्रश्न उठना स्वाभाविक है की आखिर इस्लाम की शिक्षा इस्लाम की धार्मिक कट्टरवाद की निति में कुछ तो है जो आतंकवाद की राह को प्रशस्त करता है अभी ताजा घटना ढाका आतंकी हमले की है जिसमे आतंकियों द्वारा बंधकों से कुरआन की आयतें पूछी जा रही थीं जो लोग नहीं पढ़ सके उनकी निर्मम हत्या कर दी गयी ये जघन्यतम कुकृत्य आतंक का धर्म न केवल सिद्ध करता है अपितु दुनिया के समक्ष एक बड़ा प्रश्न भी छोड़ जाता है की क्या आतंक की जड़ें इस्लाम में हैं ? इस्लाम के कुछ अनुयायी उदार हैं किन्तु उनकी संख्या दशमलव में है । आज विश्व इस मुहाने पर खड़ा है जहाँ उसे आतंकवाद को लेकर कडा रुख अख्तियार करने की आवश्यकता है । आज विश्व के अनेक राष्ट्र इस्लाम को अपने राष्ट्र में शक की नजर से देखते हैं तो इसके पीछे ठोस कारण भी हैं । भारत में आतंकवाद की घटनाओं का आंकड़ा यदि देखें साम्प्रदायिक दंगों का आंकड़ा यदि देखें तो इस्लाम कहीं न कहीं शक के दायरे में आता है । आतंकवाद का यदि इस्लाम से कोई सरोकार नहीं तो मदरसे और मकतब मस्जिदें आतंकवादियों की फैक्ट्री के रूप में क्यों कुख्यात होती जा रही हैं इस पर इस्लाम के धर्मगुरुओं को विचार करने की आवश्यकता है ।
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