सोमवार, 4 जुलाई 2016

जयतु सनातनम्

एक माँ अपने पूजा-पाठ से फुर्सत पाकर अपने विदेश में रहने वाले बेटे से फोन पर बात करते समय पूँछ बैठी: ... बेटा! कुछ पूजा-पाठ भी करते हो या फुर्सत ही नहीं मिलती?

बेटे ने माँ को बताया - "माँ,  मैं एक आनुवंशिक वैज्ञानिक हूँ ...
मैं अमेरिका में मानव के विकास पर काम कर रहा हूँ ...
विकास का सिद्धांत, चार्ल्स डार्विन... क्या आपने उसके बारे में सुना है ?"

उसकी माँ मुस्कुरा कर बोली - “मैं डार्विन के बारे में जानती हूँ, बेटा ... मैं यह भी जानती हूँ कि तुम जो सोचते हो कि उसने जो भी खोज की, वह वास्तव में सनातन-धर्म के लिए बहुत पुरानी खबर है...“

“हो सकता है माँ !” बेटे ने भी व्यंग्यपूर्वक कहा ...

“यदि तुम कुछ होशियार हो, तो इसे सुनो,” उसकी माँ ने प्रतिकार किया...
... “क्या तुमने दशावतार के बारे में सुना है ? विष्णु के दस अवतार ?”

बेटे ने सहमति में कहा "हाँ! पर दशावतार का मेरी रिसर्च से क्या लेना-देना?"

माँ फिर बोली: लेना-देना है मेरे लाल... मैं तुम्हें बताती हूँ कि तुम और मि. डार्विन क्या नहीं जानते हैं ?

पहला अवतार था मत्स्य अवतार, यानि मछली | ऐसा इसलिए कि जीवन पानी में आरम्भ हुआ | यह बात सही है या नहीं ?”

बेटा अब और अधिक ध्यानपूर्वक सुनने लगा |

उसके बाद आया दूसरा कूर्म अवतार, जिसका अर्थ है कछुआ, क्योंकि जीवन पानी से जमीन की ओर चला गया 'उभयचर (Amphibian)' | तो कछुए ने समुद्र से जमीन की ओर विकास को दर्शाया |

तीसरा था वराह अवतार, जंगली सूअर, जिसका मतलब जंगली जानवर जिनमें बहुत अधिक बुद्धि नहीं होती है | तुम उन्हें डायनासोर कहते हो, सही है ? बेटे ने आंखें फैलाते हुए सहमति जताई |

चौथा अवतार था नृसिंह अवतार, आधा मानव, आधा पशु, जंगली जानवरों से बुद्धिमान जीवों तक विकास |

पांचवें वामन अवतार था, बौना जो वास्तव में लंबा बढ़ सकता था | क्या तुम जानते हो ऐसा क्यों है ? क्योंकि मनुष्य दो प्रकार के होते थे, होमो इरेक्टस और होमो सेपिअंस, और होमो सेपिअंस ने लड़ाई जीत ली |"

बेटा दशावतार की प्रासंगिकता पर स्तब्ध हो रहा था जबकि उसकी माँ पूर्ण प्रवाह में थी...

छठा अवतार था परशुराम - वे, जिनके पास कुल्हाड़ी की ताकत थी, वो मानव जो गुफा और वन में रहने वाला था | गुस्सैल, और सामाजिक नहीं |

सातवां अवतार था मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम, सोच युक्त प्रथम सामाजिक व्यक्ति, जिन्होंने समाज के नियम बनाए और समस्त रिश्तों का आधार |

आठवां अवतार था जगद्गुरु श्री कृष्ण, राजनेता, राजनीतिज्ञ, प्रेमी जिन्होंने ने समाज के नियमों का आनन्द लेते हुए यह सिखाया कि सामाजिक ढांचे में कैसे रहकर फला-फूला जा सकता है |

नवां अवतार था भगवान बुद्ध, वे व्यक्ति जो नृसिंह से उठे और मानव के सही स्वभाव को खोजा | उन्होंने मानव द्वारा ज्ञान की अंतिम खोज की पहचान की |

और अंत में दसवां अवतार कल्कि आएगा, वह मानव जिस पर तुम काम कर रहे हो | वह मानव जो आनुवंशिक रूप से अति-श्रेष्ठ होगा |

बेटा अपनी माँ को अवाक होकर सुनता रहा |
अंत में बोल पड़ा "यह अद्भुत है माँ, भारतीय दर्शन वास्तव में अर्थपूर्ण है |"

...पुराण अर्थपूर्ण हैं | सिर्फ आपका देखने का नज़रिया होना चाहिए धार्मिक या वैज्ञानिक ?

भारत के महापुरुष एवम् उनके उद्गार

भारत के पाँच महापुरुष और उनकी बातें - इनका पालन करना हमारा कर्तव्य है...!!

महाराणा प्रताप :~ " किसी की दासता से कहीं अच्छा है कि उससे लड़ो , मारो , जीतो , या शहीद हो जाओ ! जीना है तो गर्व से , दासता में जीने से कहीं अच्छा है 1 पल गर्व से जीना "

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शिवाजी महाराज :~ " हिन्दू है तो हिन्दू धर्म की रक्षा कर , देश पर धर्म का राज कर , हिंदवी राज्य ही ईश्वर की इच्छा , उठा तलवार , शांति के लिये युद्ध जरुरी है, घुस कर मार "

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गुरु गोविंद सिंह  :~ " हाथ को तेल के डिब्बे में कोहनी तक डालो , फिर उस हाथ को तिल की बोरी में डालो , जितने तिल हाथ से चिपके उतनी बार भी मुस्लिम कसम खाये तो भरोसा मत करना "

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वीर सावरकर :~ " हिन्दु राष्ट्र से ही भारत का विकास  संभव ....
अगर किसी ने दूसरे गाल पर भी थप्पड मार दिया तो तीसरा गाल कहां से लाओगे ,
जुल्म सहोगे तो जुल्म एक दिन खा जायेगा "

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नाथूराम गोडसे :~ " जो तुम्हारे देश के खिलाफ बोलता है , उसे तोड़ने की बात करता है , तोड़ता है उसे मार दो  ...
धर्म से ही देश बनता है और देश के लिये प्राण लेना देना छोटी बात हैं ॥"

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फसल को बर्बाद करने के कारण नीलगाय को गोली मारने का आदेश दिया जा सकता है
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तो देश को बर्बाद करने वाले जेहादियों को गोली मारने के लिए सोच-विचार की क्या आवश्यकता है...?

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भक्ति और भावना

भक्ति  क्या हैं?
"भक्ति" हाथ पैरों  से नहीं होती हैं। वर्ना  विकलांग  कभी नहीं  कर पाते।
भक्ति ना  ही आँखों से होती हैं
वर्ना सूरदास जी  कभी नहीं कर पाते
          ना ही  "भक्ति "
बोलने  सुनने से होती हैं वर्ना "गूँगे""बेहरे" कभी नहीं कर पाते।
     ना ही "भक्ति"धन और ताकत से  होती हैं  वर्ना  गरीब और कमजोर  कभी नहीं कर पाते।
  "भक्ति" केवल भाव से होती हैं
    एक अहसास हैं  "भक्ति "
जो  हृदय से होकर विचारों  में आती हैं और  हमारा प्रेम  परमात्मा से  जुड़ कर रिश्ते में बदल जाती हैं।
"भक्ति"  भाव का  सच्चा  सागर हैं।। 

आशुतोष स्नेहसागर मिश्रा

वैश्विक शांति के समक्ष खतरा इस्लामिक आतंकवाद

आतंकवाद पर जब जब परिचर्चा होती है तमाम तथाकथित सेक्युलर बुद्धिजीवियों द्वारा ये तर्क प्रस्तुत किया जाता है की आतंक का कोई मजहब नहीं होता आतंकी किसी मजहब के नहीं होते किन्तु ये सर्वविदित है की विश्व के 99.9% आतंकवादी इस्लाम के अनुयायी ही होते हैं ऐसे में प्रश्न उठना स्वाभाविक है की आखिर इस्लाम की शिक्षा इस्लाम की धार्मिक कट्टरवाद की निति में कुछ तो है जो आतंकवाद की राह को प्रशस्त करता है अभी ताजा घटना ढाका आतंकी हमले की है जिसमे आतंकियों द्वारा बंधकों से कुरआन की आयतें पूछी जा रही थीं जो लोग नहीं पढ़ सके उनकी निर्मम हत्या कर दी गयी ये जघन्यतम कुकृत्य आतंक का धर्म न केवल सिद्ध करता है अपितु दुनिया के समक्ष एक बड़ा प्रश्न भी छोड़ जाता है की क्या आतंक की जड़ें इस्लाम में हैं ? इस्लाम के कुछ अनुयायी उदार हैं किन्तु उनकी संख्या दशमलव में है । आज विश्व इस मुहाने पर खड़ा है जहाँ उसे आतंकवाद को लेकर कडा रुख अख्तियार करने की आवश्यकता है । आज विश्व के अनेक राष्ट्र इस्लाम को अपने राष्ट्र में शक की नजर से देखते हैं तो इसके पीछे ठोस कारण भी हैं । भारत में आतंकवाद की घटनाओं का आंकड़ा यदि देखें साम्प्रदायिक दंगों का आंकड़ा यदि देखें तो इस्लाम कहीं न कहीं शक के दायरे में आता है । आतंकवाद का यदि इस्लाम से कोई सरोकार नहीं तो मदरसे और मकतब मस्जिदें आतंकवादियों की फैक्ट्री के रूप में क्यों कुख्यात होती जा रही हैं इस पर इस्लाम के धर्मगुरुओं को विचार करने की आवश्यकता है ।

तुष्टिकरण की घृणित राजनीति और भारत

तारिषी यह इंसानों का नहीं वोटों का मुल्क है! तुम्हें कुरान की आयत नहीं आती, यही तुम्हारी मौत की वजह बनी, यही तुम्हारी मौत पर भारत में चुप्पी की भी वजह है!
फिलिस्तीन के लिए भारत में मार्च निकालने वाले और टीवी कैमरे के आगे अफसोस जताने वाले-- आज देखो बांग्लादेश में भारत की बेटी  तारिषी जैन की मौत पर कैसे खामोश हैं! क्योंकि मरने वाले को कुरान की आयत नहीं आती थी और भारतीय राजनीति में उसके वोट का मोल कम है! क्योंकि मारने वाला कुरान की आयत पूछ-पूछ कर गला काट रहा था और भारतीय राजनीति में इनके वोट की कीमत बहुत है! 
तारिषी यह इंसानों का नहीं, वोटों का देश है!  आशुतोष स्नेहसागर मिश्रा

मक्का का रहस्य

मुसलमानों का तीर्थ है- काबा। काबा में मुहम्‍मद के वक्‍त तक तीन सौ पैंसठ मूर्तियां थी। और हर दिन की एक अलग मूर्ति थी।

वह तीन सौ पैंसठ मूर्तियां हटा दी गयी, फेंक दी गई। लेकिन जो केंद्रीय पत्‍थर था मूर्तियों का, जो मंदिर को केंद्र था, वह नहीं हटाया गया। तो काबा मुसलमानों से बहुत ज्‍यादा पुरानी जगह है। मुसलमानों की तो उम्र बहुत लंबी नहीं है, मात्र चौदह सौ वर्ष।

लेकिन काबा लाखों वर्ष पुराना पत्‍थर है। और भी दूसरे एक मजे की बात है कि वह पत्‍थर जमीन का नहीं है। एक ही दृष्टिकोण था हमारे पास कि वह उल्‍कापात में गिरा हुआ किसी दुसरे ग्रह का पत्‍थर है।

अगर कभी कोई चाँद पर कोई भी जीवन विकसित हुआ, या किसी और ग्रह से चाँद पर पहुंचा, और वह चीजें मिलेंगी, तो उनके लिए भी कठिनाई होगी कि वे कहां से आयी है ? उनके लिए भी कठिनाई होगी।

काबा का जो पत्‍थर है वह सिर्फ उल्‍कापात में गिरा हुआ पत्‍थर नहीं है। वह पत्‍थर पृथ्‍वी पर किन्‍हीं और ग्रहों के यात्रियों द्वारा छोड़ा गया पत्‍थर है। और उस पत्‍थर के माध्‍यम से उस ग्रह के यात्रियों से संबंध स्‍थापित किए जा सकते थे। लेकिन पीछे सिर्फ उसकी पूजा रह गयी। उसका पूरा विज्ञान खो गया, क्‍योंकि उससे संबंध के सब सूत्र खो गए।

आज से साढ़े चौदह सौ वर्ष पूर्व अन्तिम अवतार मुहम्मद ने कहा था कि हज्रे अस्वद (काला पत्थर) स्वर्ग से उतरा है (तिर्मिज़ी) और आज विज्ञान ने भी खोज करके सिद्ध कर दिया कि वास्तव में यह पत्थर किसी अन्य ग्रह का है, पृथ्वी का नहीं ।

इस खोज का सिहरा ब्रीटेन के एक वैज्ञानिक रिचर्ड डिबर्टन के सर जाता है जो स्वयं को मुस्लिम सिद्ध करते हुए काबा का दर्शन करने के लिए मक्का आया, वह अरबी भाषा जानता था । जब मक्का पहुंचा तो काबा में दाखिल हुआ और हज्रे अस्वद से एक टुकड़ा प्रप्त करने में सफल हो गया। उसे अपने साथ लंदन लाया और ज्यूलोजी की लिबार्ट्री में उस पर तजर्बा शुरू कर दिया।

खोज के बाद इस परिणाम पर पहुंचा कि हज्रे अस्वद धरती के पत्थरों में से कोई पत्थर नहीं बल्कि दूर किसी ग्रह से उतरा हुआ पत्थर है। और उसने अपनी पुस्तक ( मक्का और मदीना की यात्रा) में इस तथ्य को स्पष्ट किया। यह पुस्तक 1956 में अंग्रेजी भाषा में लंदन से प्रकाशित हुई।

रजनीश ओशो

सुन्दरकाण्ड नाम क्यों ?

*सुन्दरकाण्ड*

*सुन्दरकाण्ड का नाम सुन्दरकाण्ड क्यों रखा गया?*

हनुमानजी, सीताजी की खोज में लंका गए थे और लंका त्रिकुटाचल पर्वत पर बसी हुई थी। त्रिकुटाचल पर्वत पर तीन पर्वत थे:

पहला सुबैल पर्वत, जहां के मैदान में युद्ध हुआ था।

दूसरा नील पर्वत, जहाँ राक्षसों के महल बने हुए थें।

तीसरे पर्वत का नाम है सुन्दर पर्वत, जहां अशोक वाटिका निर्मित थी। इसी वाटिका में हनुमानजी और सीताजी की भेंट हुई थी।

इस काण्ड की यहीं सबसे प्रमुख घटना थी, इसलिए इसका नाम सुन्दरकाण्ड रखा गया है।

*शुभ अवसरों पर ही सुन्दरकाण्ड का पाठ क्यों?*

शुभ अवसरों पर गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड का पाठ किया जाता हैं। शुभ कार्य सुन्दरकाण्ड का पाठ करने का विशेष महत्व माना गया है।

जबकि किसी व्यक्ति के जीवन में ज्यादा परेशानियाँ हो, कोई काम नहीं बन पा रहा है, आत्मविश्वास की कमी हो या कोई और। समस्या हो, सुन्दरकाण्ड के पाठ सें शुभ फल प्राप्त होने लग जाते है, कई ज्योतिषी या संत भी विपरीत परिस्थितियों में सुन्दरकाण्ड करने की सलाह देते हैं।

*सुन्दरकाण्ड का पाठ विशेष रूप से क्यों किया जाता है?*

माना जाता है कि सुन्दरकाण्ड के पाठ से हनुमानजी प्रसन्न होते है। सुन्दरकाण्ड के पाठ में बजरंगबली की कृपा बहुत ही  जल्दी प्राप्त हो जाती है। जो लोग नियमित रूप से सुन्दरकाण्ड का पाठ करते हैं,  उनके सभी दुख दूर हो जातें हैं, इस काण्ड में हनुमानजी ने अपनी बुद्धि और बल से सीता की खोज की है।

इसी वजह से सुन्दरकाण्ड को हनुमानजी की सफलता के लिए याद किया जाता है।

*सुन्दरकाण्ड से मिलता है मनोवैज्ञानिक लाभ*

वास्तव में श्रीरामचरितमानस कें सुन्दरकाण्ड की कथा सबसे अलग हैं, संपूर्ण श्रीरामचरितमानस भगवान श्रीराम के गुणों और उनके पुरुषार्थ को दर्शाती है, सुन्दरकाण्ड एकमात्र ऐसा अध्याय है जो श्रीराम के भक्त हनुमान की विजय का काण्ड  है।

मनोवैज्ञानिक नज़रिये से देखा जाए तो यह आत्मविश्वास और इच्छाशक्ति बढ़ाने वाला काण्ड है, सुन्दरकाण्ड के पाठ से व्यक्ति को मानसिक शक्ति प्राप्त होती है, किसी भी कार्य को पूर्ण करने के लिए आत्मविश्वास मिलता है।

*सुन्दरकाण्ड से मिलता है धार्मिक लाभ*

सुन्दरकाण्ड के पाठ से मिलता है धार्मिक लाभ। हनुमानजी की पूजा सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली मानी गई है।

बजरंगबली बहुत जल्दी प्रसन्न होने वालें देवता हैं,शास्त्रों में इनकी कृपा पाने के कई उपाय बताए गए हैं। इन्हीं उपायों में से एक उपाय सुन्दरकाण्ड का पाठ करना है। सुन्दरकाण्ड के पाठ से हनुमानजी के साथ ही श्रीराम की भी विशेष कृपा प्राप्त होती है।

किसी भी प्रकार की परेशानी हो सुन्दरकाण्ड के पाठ से दूर हो जाती है, यह एक श्रेष्ठ और सरल उपाय है। इसी वजह से काफी लोग सुन्दरकाण्ड का पाठ नियमित रूप से करते हैं।

हनुमानजी जो कि वानर थें, वे समुद्र को लांघकर लंका पहुंच गए वहां सीताजी की खोज की, लंका को जलाया, सीताजी का संदेश लेकर श्रीराम के पास लौट आए। यह एक भक्त की जीत का काण्ड है, जो अपनी इच्छाशक्ति के बल पर इतना बड़ा चमत्कार कर सकता है।

सुन्दरकाण्ड में जीवन की सफलता के महत्वपूर्ण सूत्र भी दिए गए हैं, निःस्वार्थ भाव से सेवा करने से जीवन में सम्मान कैसे प्राप्त हो, इसका जीवंत उदाहरण सुन्दरकाण्ड ही हो सकता है।

इसलिए पूरे मानस में सुन्दरकाण्ड को सबसे श्रेष्ठ माना जाता है।

आशुतोष स्नेहसागर मिश्रा

snatanudghoshparishad.blogspot.com


सनातन उद्घोष : अचूक उपाय

 कैसे मिलेगी सुख शांति कैसे लगेगा बच्चों का भवपढ़ाई में ध्यान सनातन उद्घोष : अचूक उपाय

अचूक उपाय

उपाय विशेष :
घर में सुख-शान्ति न हो तो पीपल पर सरसों के तेल का दीया जलाना और जला कर काले माह (उड़द ) के तीन दाने दीये में डालना चाहिए, ऐसा तीन शनिवार शाम को करें।
दुर्घटना या सर्जरी का भय हो तो तांबें के बर्तन में गुड़ हनुमान जी के मन्दिर में देने से बचाव होता है और अगर सरसों के तेल का दीया वहीं जलाये और वहीं बैठ कर हनुमान चालीसा पढ़े और हलवा चढाये तो काफ़ी बचाव होता है, ऐसा चार मंगलवार रात्रि करें।
बहन भाईओं से कोई समस्या हो तो सवा किलो गुड़ जमीन में दबाने से समझौता होता है, ऐसा मंगलवार को करें।
बच्चों की पढ़ाई के लिए सवा मीटर पीले कपडें में २ किलो चने की दाल बांधकर लक्ष्मी-नारायण जी के मन्दिर में चढाये, ऐसा पाँच शाम वीरवार को करें।
कमर, गर्दन में तकलीफ रहती हो तो दोनों पैरों के अंगूठे में काला सफ़ेद धागा बांधें।

आशुतोष स्नेहसागर मिश्रा

सनातन संस्कृति एवम् विज्ञान

पृथ्वी का भोगोलिक मानचित्र:

वेद व्यास द्वारामहाभारत में पृथ्वी का पूरा मानचित्र हजारों वर्ष पूर्व ही दे दिया गया था...

महाभारत में कहा गया है कि यह पृथ्वी चन्द्रमंडल में देखने पर दो अंशों मे खरगोश तथा अन्य दो अंशों में पिप्पल (पत्तों) के रुप में दिखायी देती है-उपरोक्त मानचित्र ११वीं शताब्दी में रामानुजचार्य द्वारा महाभारत के निम्नलिखित श्लोक को पढ्ने के बाद बनाया गया था-“ सुदर्शनं प्रवक्ष्यामि द्वीपं तु कुरुनन्दन। परिमण्डलो महाराज द्वीपोऽसौ चक्रसंस्थितः॥यथा हि पुरुषः पश्येदादर्शे मुखमात्मनः। एवं सुदर्शनद्वीपो दृश्यते चन्द्रमण्डले॥ द्विरंशे पिप्पलस्तत्र द्विरंशे च शशो महान्।”—

वेद व्यास, भीष्म पर्व, महाभारतअर्थातहे कुरुनन्दन ! सुदर्शन नामक यह द्वीप चक्र की भाँति गोलाकार स्थित है, जैसे पुरुष दर्पण में अपना मुख देखता है, उसी प्रकार यह द्वीप चन्द्रमण्डल में दिखायी देता है। इसके दो अंशो मे पिप्पल और दो अंशो मे महान शश(खरगोश) दिखायी देता है...

अब यदि उपरोक्त संरचना को कागज पर बनाकर व्यवस्थित करे तो हमारी पृथ्वी का मानचित्र बन जाता है, जो हमारी पृथ्वी के वास्तविक मानचित्र से बहुत समानता दिखाता है....

हिंदुत्व एक जीवन दर्शन

हिन्दू धर्म के सिद्धान्त के कुछ मुख्य बिन्दु:
1. ईश्वर एक नाम अनेक.
2. ब्रह्म या परम तत्त्व सर्वव्यापी है.
3. ईश्वर से डरें नहीं, प्रेम करें और प्रेरणा लें.
4. हिन्दुत्व का लक्ष्य स्वर्ग-नरक से ऊपर.
5. हिन्दुओं में कोई एक पैगम्बर नहीं है.
6. धर्म की रक्षा के लिए ईश्वर बार-बार पैदा होते हैं.
7. परोपकार पुण्य है, दूसरों को कष्ट देना पाप है.
8. जीवमात्र की सेवा ही परमात्मा की सेवा है.
9. स्त्री आदरणीय है.
10. सती का अर्थ पति के प्रति सत्यनिष्ठा है.
11. हिन्दुत्व का वास हिन्दू के मन, संस्कार और परम्पराओं में.
12. पर्यावरण की रक्षा को उच्च प्राथमिकता.
13. हिन्दू दृष्टि समतावादी एवं समन्वयवादी.
14. आत्मा अजर-अमर है.
15. सबसे बड़ा मंत्र गायत्री मंत्र.
16. हिन्दुओं के पर्व और त्योहार खुशियों से जुड़े हैं.
17. हिन्दुत्व का लक्ष्य पुरुषार्थ है और मध्य मार्ग को सर्वोत्तम माना गया है.
18. हिन्दुत्व एकत्व का दर्शन है.

जीवन दर्शन

"इतनी महान प्रयत्न करने की आकांक्षा चाहिए, अभीप्सा चाहिए, कि तुम अपने को पूरा दांव पर लगा दो। मोक्ष ख़रीदा जा सकता है, लेकिन तुम अपने को पूरा दांव पर लगा दो तो ही; इससे कम में नहीं चलेगा। कुछ और तुमने दिया वह देना नहीं है, वह कीमत नहीं चुकाई तुमने। अपने को पूरा दे डालोगे तो ही कीमत चुकती है और उपलब्धि होती है।"

आशुतोष स्नेहसागर मिश्रा

महात्मा बुद्ध की परिनिर्वाण स्थली एवम् पौराणिक हिरण्यवती नदी

हिरण्यवती: एक नदी का अपने उद्धार के लिए तड़पना (संस्कृति और इतिहास)

    भारतीय संस्कृति में नदियों का विशेष महत्त्व है। नदियों को जीवन-दायिनी कहा गया है। जिस प्रकार माँ जीवन देती है, हमारी नदियाँ भी अपने विविध माध्यमों से जीवन देती हैं, जीवन की रक्षा करती हैं। अतः नदियों को भी माँ कहा जाता है। नदियों से पीने के लिए जल मिलता रहा है। भोजन के लिए मछलियाँ और खेती के लिए उपजाऊ मिट्टी। तभी तो नदियों के किनारे अधिक जनसंख्या का वास होता है। इतिहास साक्षी है कि नदियों के किनारे ही अनेक सभ्यताओं, संस्कृतियों का विकास हुआ है। नदियाँ सुदूर यात्रा का सबसे सशक्त एवं प्रथम माध्यम रही हैं। सिंधु, हड़प्पा, मोहनजोदड़ो से लेकर मेसोपोटामिया, मिस्र और चीन की सभ्यता का विकास हो या सरयू किनारे अयोध्या, यमुना किनारे मथुरा हो या नारायणी-गंडक के कछार का लुम्बिनी हो, सबका अपना महत्त्व है। किसी भी काल-खंड, किसी भी सभ्यता और किसी भी समाज में नदियों के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता है
    इतिहास के पन्नों से लेकर भारत के वर्तमान स्वरूप तक उत्तर-प्रदेश के कुशीनगर का एक अलग महत्त्व है। कुशीनगर शब्द कान में आते ही भगवान बुद्ध की स्मृति आ जाती है। कुशीनगर उत्तर-प्रदेश का एक जिला है। कुशीनगर का संबंध भले ही भगवान बुद्ध से है, परन्तु इसका नामकरण कुश नामक राजा से जुड़ा कहा जाता है। कई विचारकों के अनुसार राजा कुश भगवान राम के पुत्र थे, जिन्होंने अपनी प्रेयसी के लिए एक नगर की स्थापना की, जिसका नाम कुशीनगर पड़ा। इतिहासकारों के अनुसार कुशीनगर एक बहुत ही सुरम्य स्थल था। प्राकृतिक सुन्दरता यहाँ के कण-कण में व्याप्त थी। यह सदानिरा हिरण्यवती नदी के तट पर स्थित नगरी है। यह नगरी मल्ल-राजाओं की राजधानी भी रही है।

    इतिहास की माने तो महापरिनिर्वाण के बाद बुद्ध के शरीर का दाहकर्म मुकुटबंधन चैत्य में हुआ था जो वर्तमान में रामाभार है। बुद्ध की अस्थियाँ संथागार में रखी गई थीं। बाद में उन अस्थियों को उत्तर भारत के आठ राजाओं ने आपस में बाँट लिया था। मल्ल राजाओं ने मुकुटबंधन चैत्य के स्थान पर एक विशाल स्तूप बनवाया था। बुद्ध के पश्चात कुशीनगर को मगध नरेश अजातशत्रु ने जीतकर मगध में सम्मिलित कर लिया था। तब यहाँ का गणराज्य सदा के लिए समाप्त हो गया था। बहुत दिनों तक यहाँ अनेक स्तूप और विहार आदि बने रहे और दूर-दूर से बौद्ध यात्रियों का आगमन होता रहा।

    बौद्ध अनुश्रुति के अनुसार मौर्य सम्राट अशोक ने कुशीनगर की यात्रा की थी और एक लाख मुद्रा व्यय करके यहाँ के चैत्य का पुननिर्माण करवाया था। युवानच्वांग के अनुसार अशोक ने यहाँ तीन स्तूप और दो स्तंभ बनवाए थे। अशोक के बाद कनिष्क ने भी कुशीनगर में कई विहारों का निर्माण करवाया। गुप्तकाल में भी यहाँ अनेक विहारों का निर्माण हुआ तथा पुराने भवनों का जीर्णोद्धार भी किया गया। गुप्त राजाओं की धार्मिक उदारता के कारण बौद्ध संघ को कोई कष्ट न हुआ। कुमार गुप्त के समय हरिबल नामक एक श्रेष्ठी ने परिनिर्वाण मंदिर में बुद्ध की बीस फूट ऊँची प्रतिमा की स्थापना करवाई। शायद उस काल-खंड में हिरण्यवती रम्य रही होगी, तभी तो किसी नरेश, सम्राट या राजा को उसके जीर्णोद्धार की जरूरत नहीं पड़ी। छठी व सातवीं शताब्दी के बाद कुशीनगर उजड़ना शुरू हो गया। हर्ष के शासनकाल में कुशीनगर नष्ट प्राय हो गया था, यद्यपि यहाँ भिक्षुओं की पर्याप्त संख्या थी। युवान के परवर्ती दूसरे चीनी यात्री इत्सिंग के वर्णन से ज्ञात होता है कि उसके समय में कुशीनगर में सर्वास्तित्ववादी भिक्षुओं का आधिपत्य था। 16वीं शती में मुसलमानों के आक्रमण के साथ ही कुशीनगर इतिहास के गर्त में लुप्त सा हो  गया। संभवतः 18वीं शताब्दी में मुगल शासकों ने यहाँ के सभी विहारों तथा अन्य महत्त्वपूर्ण भवनों को तहस-नहस कर दिया था। तब भी हिरण्यवती की धारा बहती रही। सच ही कहा जाता है कि प्रकृति किसी का बर्चस्व नहीं स्वीकार करती

    बौद्ध साहित्य में कुशीनगर का विशद वर्णन प्राप्त है। इसमें कुशीनगर के साथ कुशीनारा, कुशीनगरी, कुशीग्राम आदि अन्य नामों का उल्लेख है। हिरण्यवती का भी उल्लेख है। बुद्ध के पूर्व के समय में यह नगरी कुशावती के नाम से प्रसिद्ध थी। बुद्ध ने स्वयं कुशावती से ही अभिहित किया है, जो एक विस्तृत राज्य था। रक्षा एवं व्यापार की स्थिति से भी इस नगर की स्थिति सर्वथा अनुकूल थी। जलीय यातायात के लिए हिरण्यवती उपयुक्त माध्यम थी। नगर के समीप ही उपवत्तन नामक शालवन था। कुशीनगर बहुत समृद्धशाली नगरी थी। स्वयं गौतम बुद्ध ने इस नगरी की प्रशंसा की है। बुद्धघोष में उन सभी विशिष्ट कारणों का वर्णन मिलता है जिससे प्रेरित होकर गौतम बुद्ध ने इस नगरी को अपने परिनिर्वाण के लिए चुना था। इस नगरी और इसके पूर्व दिशा में बहने वाली हिरण्यवती से बुद्ध को विशेष लगाव था। पूर्व जन्मों में भी यह नगरी उनकी क्रीड़ास्थली थी। कल-कल निनादिनी हिरण्यवती अपने स्वच्छ एवं पवित्र जल के कारण आकर्षण का कारण बनी रहती थी। हिरण्यवती में असंख्य प्रकार के जीवों का वास था। वह मछलियों आदि से लबालब थी। हिरण्यवती के सानिध्य के कारण उन जीवों में भी आपसी साहचर्य, प्रेम और मित्रता का वास था। अहिंसा के उपासक बुद्ध जब कुशीनगर पधारे, तब उन्होंने इसी हिरण्यवती से जल ग्रहण भी किया था। बुद्ध के लिए हिरण्यवती उन नदियों में से थी, जिनके किनारे का जीवन धन-धान्य से पूर्ण रहने वाला था तथा जिसके किनारे का परिनिर्वाण पिछले असंख्य जन्मों के पापों को नष्ट करने वाला था। हिरण्यवती के किनारे का निर्वाण आवागम के बंधन से मुक्त कर देता है।

    सत्य, अहिंसा, त्याग और करूणा के प्रतिमूर्ति भगवान बुद्ध का परिनिर्वाण कुशीनगर में हुआ। कुशीनगर का इतिहास बहुत प्राचीन है। भगवान बुद्ध से भी पहले का। हिरण्यवती नदी का अस्तित्व भी बहुत पुराना है। यह नदी भगवान बुद्ध के समय तो अवश्य ही थी।  इतिहास की माने तो भगवान बुद्ध ने कुशीनगर में हिरण्यवती नदी से जल ग्रहण किया था। अतः बौद्धों के लिए भी यह नदी अति पावन है। आज यह नदी अपने अस्तित्व के लिए संर्घष कर रही है। कुशीनगर में इसका आकार झील सरीखा हो जाता है। कई जगह पुरातत्व विभाग के अभिलेखों में इसे रामाभार ताल के नाम से अभिहित किया गया है। पहले इस ताल का क्षेत्रफल दो वर्ग कि. मी. था, परन्तु वर्तमान में आधा वर्ग कि. मी. के आस-पास रह गया है। इतिहासकारों का एक वर्ग यह भी मानता है कि अतीत में यह क्षेत्र मल्ल राजाओं का उपवन था। यहाँ कभी क्रीड़ा स्थल और पक्षी विहार भी था। आज हाई वे की फर्राटा दौड़ के शोर में कोई नहीं सुनता कि पावन हिरण्यवती अपने उद्धार एवं अस्तित्व के लिए गुहार कर रही है। अपने जीवन के लिए संघर्ष कर रही है।

    कुशीनगर के लिए वर्तमान समय में मैत्रेय योजना की काफी चर्चा है। किसानों को उनकी अधिगृहित भूमि के लिए रूपए वितरित किए जा रहे हैं। हवाई पट्टी का विस्तार अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा के रूप में हो रहा है। वहीं समाचार पत्रों के माध्यम से हिरण्यवती के लिए एक सुखद समाचार मिल रहा है कि उसे उसके अतीत के स्वरूप में लाने के लिए जिला प्रशासन ने कमर कस लिया है। योजना है कि मनरेगा के तहत तीन करोड़ रूपए की लागत से तीस मीटर चौड़ी हिरण्यवती के पाट को बाइस मीटर में समेटकर तथा इसकी गहराई बढ़ाकर इसे पानी से लबालब किया जाएगा। यह समाचार स्वागत योग्य है। बस प्रार्थना तो इस बात की है कि उसके प्राकृतिक स्वरूप के साथ कोई बलात्कार न हो। जागरूक प्रशासन चाहे तो कोई अन्य उपाय भी खोज ले। कोई ऐसा उपाय, जिसके माध्यम से इसकी प्राकृतिक सुन्दरता में चार चाँद लगाया जा सके!

    जो भी हो, आगे योजना है कि हिरण्यवती को उसके वर्तमान उद्गम स्थल नेबुआ नौरंगिया से लेकर फाजिलनगर ब्लाॅक के त्रिमुहानी घाट तक व्यवस्थित किया जाएगा। चर्चा है कि डी आर डी ए ने योजना को अंतिम रूप दे दिया है। पत्रावली तकनीकी स्वीकृति के लिए सिचाई विभाग को भेजी गई है। औपचारिकता पूरी होते ही योजना पर अमल होने लगेगा।  योजनानुरूप हिरण्यवती के उद्धार के बाद बौद्ध अनुयायी और पर्यटक कुशीनगर के इतिहास से परिचित तो होंगे ही, हिरण्यवती के गोद में सौंदर्य का उपभोग करेंगे। नौकायन, तैराकी आदि जल-क्रीड़ा का आनंद उठाएँगे। अभी तक यहाँ आने वाले पर्यटकों के लिए केवल मंदिर परिक्षेत्र ही है। हिरण्यवती तो उपेक्षा के कारण स्वयं ही याचक बनी अपने उद्धार की याचना कर रही है। कैसी विडम्बना है यह! . . . . जिस देश की संस्कृति में नदियों को माँ कहा गया है, जीवन-दायिनी से अभिहीत किया गया है, उस देश में हिरण्यवती अपने ही उद्धार की याचना कर रही है। हे मानव! कहाँ विचलित होता जा रहा है तू? . . . . . जीवन-रेखा की आधार नदियाँ जो पहले मानव का उद्धार करती रहीं हैं, अब वे मानव से स्वयं के उद्धार की याचना कर रही हैं और दंभी मानव अपने आदमी होने के दंभ में जल-स्रोत नदियों का दोहन, शोषण करता जा रहा है।

    कुशीनगर का ऐतिहासिक स्थल अपने इतिहास के कारण पर्यटकों को आकर्षित तो करता है, परन्तु पर्यटन विभाग मंदिरों के अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार के जीर्णोंद्धार एवं निर्माण में रूचि नहीं दिखाता।  परिणामतः पर्यटक जल्द ही इस धरती से वापस चले जाते हैं। देश भर में गंगा, यमुना आदि नदियों की गंदगी को साफ करने के लिए जद्दो-जहद चल रहा है। तमाम धार्मिक एवं सामाजिक संगठन इसके लिए धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। हर प्रकार से प्रशासन का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं। तो वहीं भगवान बुद्ध के इतिहास से जुड़ी हिरण्यवती कभी उपेक्षा की शिकार हो रही है तो कभी उसमें किसी चीनी मील का कचरा फेंक दिया जाता है। गुरूर में उन्मत्त  मानव अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारता जा रहा है और दंभ इस बात का कि हमने कचरा बहा दिया
    हम इतिहास की बातों पर यदि विश्वास न करें और वर्तमान में हिरण्यवती की महिमा का पता लगाएँ तब भी बात स्पष्ट हो जाती है। हिरण्यवती आज भी हमेशा जल युक्त रहती है। धीर एवं गंभीर इसका स्वभाव है। आज भी इसकी धारा अपने किनारे के उपजाऊ खेतों को काटकर तहस-नहस नहीं करती, बल्कि और ऊर्वर बना देती है। हिरण्यवती के कछारों में अकूत सब्जियों का उत्पादन होता है, जो व्यवसाय के लिए उपयुक्त हैं। मल्लुडीह का चकचकिया का बाजार इसका उदाहरण है। हल्दी, केला फल आदि की खेती इसके कछार-क्षेत्रों में सहज ही देखा जा सकता है। जीवन जीने के अनेक बहाने हिरण्यवती के किनारों में मिल जाते हैं। जहाँ जीवन के बहाने हैं तो वहीं आज भी अनगिनत ऐसे घाट हैं जहाँ मृत्यु के बाद शरीर का अंतिम-संस्कार किया जाता है। अर्थात् जीवन से मृत्यु तक साथ देने वाली हिरण्यवती का जीवन ही संर्घषमय हो गया है। स्थानीय लोगों की नीरसता और प्रशासन की उपेक्षा की शिकार हिरण्यवती अपना उद्धार चाह रही है। कुशीनगर प्रशासन सजह हो रहा है और कुछ कार्यों पर निर्णय भी लिया जा रहा है। परन्तु किर्यान्वयन के लिए अभी प्रशासनिक आदेशों की सहमति की मुँह ताकती योजनाएँ किस प्रकार एक पावन नदी का उद्धार करने में सक्षम होंगी? यह तो समय ही स्पष्ट करेगा।

    कैसा हो कि किसी कार्य-योजना से हिरण्यवती को गंडक या अन्य किसी नदी से जोड़ दिया जाए? ‘नदियों को जोड़ो’ योजना का एक अध्याय शांति, ज्ञान और अहिंसा के रूप बुद्ध की परिनिर्वाण स्थली से ही प्रारंभ किया जाए? गंडक की तबाही कुछ कम होगी और हिरण्यवती के उद्धार की माँग भी पूरी हो जाएगी। डुबती जिंदगियाँ सहर्ष संर्घष को स्वीकारेंगी और सूखती हिरण्यवती अपने सौंदर्य को और निखारेगी। क्या कुशीनगर में पर्यटन के विकास में हिरण्यवती के योगदन को बिसारा जा सकता है? क्या पर्यटक कृतिम तरण-तालों की अपेक्षा इस प्राकृतिक हिरण्यवती को नहीं छूना चाहेंगे? परन्तु पर्यटन के विकास के साथ इसके लिए भी एक योजना चलाने की आवश्यकता है। योजना, नदियों के पीड़ा को समझने का। योजना हिरण्यवती के उद्धार का। योजना सांस्कृतिक विरासतों की रक्षा का। योजना, सामाजिक जागरण का। योजना मानवीय विवेक का।

मनुष्य हजारों वर्षों से पानी का संरक्षण करता आया है। कुओं, तालाबों और बावडि़यों के साथ ही नदियों की अर्चना-आराधना जल के सत्ता को स्वीकारना ही तो है। विश्व के प्रायः सभी समुदाय अपनी नदियों के जल का भरपूर उपयोग करना चाहते हैं। बाँध, बिजली संयंत्र, नहर आदि तो यहीं स्पष्ट करते हैं न! तब अहिंसा के रूप बुद्ध की परिनिर्वाण स्थली में हिरण्यवती के प्रति उदासीनता क्यों? यह प्रश्न केवल एक लेख के कारण ही नहीं है, इतिहास, धर्म, आध्यात्म और यथार्थ की उपयोगिता के आधार पर कहा जा रहा है। कई मनस्वी और अनगिनत संस्थाएँ नदियों को बचाने के लिए, उनके उद्धार के लिए प्रयास करती रही हैं। नर्मदा के लिए मेधा पाटेकर का प्रयास हो या बंजर नदी के लिए अमृतलाल बेगड़ का प्रयास, गंगा रक्षा मंच और प्रो. जी. डी. अग्रवाल का गंगा बचाओ अभियान हो या यमुना के उद्धार की बातें, सुई, कारो, बनास, कुआनों आदि देश की अधिकांश नदियों के उद्धार एवं संरक्षण की चर्चाएँ होती रही हैं, फिर हिरण्यवती द्वारा सिंचित भूमि ऊसर कैसे हो गई कि उसकी रक्षा में उसका कोई लाल सामने नहीं आ रहा? किसी विद्वान या किसी चिंतक की नजर हिरण्यवती के घावों को क्यों नहीं देखती? क्या उसके जर्जर अस्तित्व पर किसी राजनैतिक व्यक्ति की नीति नहीं तैयार हो सकती? क्या सामाजिक सोच का मन इस पर नहीं सोच सकता? प्रश्न तो सबसे है। इसका उत्तर भी सबके पास है। देखना है कि आपके उत्तर की शैली क्या है?

    इतिहास के बहाने कहा जा सकता है कि जब मनुष्य असभ्य था, तब नदियाँ स्वच्छ एवं समृद्ध थीं। आज जब मनुष्य सभ्य एवं आधुनिक हो गया है, तो नदियाँ जर्जर, गंदी और जहरीली हो गई हैं। हिरण्यवती की दशा भी कुछ अलग नहीं है। तब तो हिरण्यवती में ही स्वयं की स्वच्छता बनाए रखने की क्षमता थी, परन्तु दूषित मानसिकता और वातावरण में व्याप्त प्रदूषण के कारण अब स्वयं वही मृतप्राय हो गई है। हे मानव! तभी तो हिरण्यवती अपने ही उद्धार के लिए तड़प रही है ।

आशुतोष स्नेहसागर मिश्रा